Valmiki ka jivan Parichay

 

महर्षि वाल्मीकि को संस्कृत साहित्य का आदिकवि (पहले कवि) माना जाता है और वे महाकाव्य रामायण के रचयिता के रूप में पूजनीय हैं। उनका जीवन चरित्र, पाप से पुण्य की ओर एक महान परिवर्तन की कहानी है।


महर्षि वाल्मीकि का जीवन परिचय

विवरण (Detail) जानकारी (Information)

अन्य नाम रत्नाकर (पूर्व नाम), प्राचेतस, आदिकवि

पिता वरुण (प्रचेता), महर्षि कश्यप और अदिति के पुत्र माने जाते हैं।

मुख्य कार्य वाल्मीकि रामायण (संस्कृत का पहला महाकाव्य 'आदिकाव्य'), योगवासिष्ठ

सम्मान आदिकवि (प्रथम कवि)

प्रारंभिक जीवन और रत्नाकर से वाल्मीकि बनने की कथा

पौराणिक कथाओं के अनुसार, वाल्मीकि जी का जन्म महर्षि प्रचेता के पुत्र के रूप में हुआ था, लेकिन कुछ परिस्थितियों के कारण उनका पालन-पोषण भील समुदाय में हुआ।


डाकू रत्नाकर: युवावस्था में, वे रत्नाकर नामक एक क्रूर डाकू बन गए, जो अपने परिवार के भरण-पोषण के लिए जंगल से गुजरने वाले लोगों को लूटता था।


नारद मुनि से भेंट: एक बार, उनकी भेंट देवर्षि नारद मुनि से हुई। रत्नाकर ने नारद मुनि को भी लूटना चाहा। नारद ने उससे पूछा कि वह ये पाप क्यों कर रहा है, जिस पर रत्नाकर ने कहा कि वह अपने परिवार के लिए करता है। नारद ने तब उससे पूछा कि क्या उसका परिवार उसके पापों का भागीदार बनने को तैयार है।


परिवर्तन: जब रत्नाकर ने अपने परिवार से यह सवाल पूछा, तो सभी ने उसके पापों में भागीदार बनने से इनकार कर दिया। इस घटना से रत्नाकर का हृदय परिवर्तन हो गया और उन्हें अपने कर्मों का बोध हुआ।


तपस्या और वाल्मीकि नाम: पश्चाताप की अग्नि में जलकर, रत्नाकर ने कठोर तपस्या शुरू कर दी। नारद मुनि के निर्देश पर, उन्होंने 'मरा' (अर्थात 'मर') शब्द का जप शुरू किया, जो वर्षों की तपस्या के बाद 'राम' में बदल गया। वे इतनी गहन तपस्या में लीन हो गए कि उनके चारों ओर दीमक की बांबी (मिट्टी का ढेर) बन गई। बांबी को संस्कृत में 'वल्मीक' कहते हैं। बांबी से निकलने के कारण ही उनका नाम वाल्मीकि पड़ा।


आदिकाव्य 'रामायण' की रचना

वाल्मीकि जी को आदिकवि की उपाधि इसलिए मिली क्योंकि उनके मुख से संस्कृत का पहला श्लोक अनायास ही निकला था:


क्रौंच वध की घटना: एक बार महर्षि वाल्मीकि तमसा नदी के तट पर थे। उन्होंने एक बहेलिए को क्रौंच पक्षी के जोड़े में से एक को मारते हुए देखा। नर पक्षी की मृत्यु पर मादा पक्षी का विलाप देखकर महर्षि द्रवित हो गए। उनके मुख से स्वतः ही श्राप के रूप में एक श्लोक निकला।


पहला श्लोक (आदिकाव्य):


"मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः।

यत्क्रौंचमिथुनादेकम् अवधीः काममोहितम्।।"


(अर्थात: हे निषाद! तुझे कभी शांति न मिले, क्योंकि तूने प्रेम में लीन क्रौंच पक्षी के जोड़े में से एक का वध कर दिया।)


यह छंद 'अनुष्टुप' छंद में था, और यही वाल्मीकि रामायण के लिए प्रेरणा और आधार बना। उन्होंने 24,000 श्लोकों में इस महाकाव्य की रचना की।


बाद में, माता सीता ने अपने पुत्रों लव और कुश को वाल्मीकि के आश्रम में ही जन्म दिया और उन्होंने ही लव-कुश को रामायण का ज्ञान दिया।


महर्षि वाल्मीकि का जीवन यह दर्शाता है कि कोई भी व्यक्ति अपने दृढ़ संकल्प, पश्चाताप और भक्ति के बल पर अपने जीवन को ब

दलकर महानता को प्राप्त कर सकता है।


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